Wednesday, 25 November 2015

Friday, 20 November 2015

Yesterday 19.11.2015 cheaf minister of uttarakhand harish rawat & Mahamndleshwar swami Dr Umakantanand Sarswati ji maharaj

Monday, 16 November 2015

👆👆👆👆👆छठ पर्व का रहस्य?
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि यह दिन भगवान सूर्य को समर्पित है। बिहार और पूर्वांचल के निवासी इस दिन जहां भी होते हैं सूर्य भगवान की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना नहीं भूलते।

यही कारण है कि यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।

इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है इसलिए इसे पर्व को हठयोग भी माना जाता है। इस कठिन पर्व की शुरुआत कैसे हुई और किसने इस पर्व को शुरु किया इस विषय में अलग-अलग मान्यताएं हैं।
👉क्या भगवान राम और सीता ने किया सबसे पहले छठ?
भगवान राम सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता सूर्य देव थे। इसलिए भगवान राम और सीता जब लंका से रावण वध करके अयोध्या वापस लौटे तो अपने कुलदेवता का आशीर्वाद पाने के लिए इन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया।

सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे।
👉महाभारत के इस योद्घा ने शुरु किया था छठ पर्व?
महाभारत का एक प्रमुख पात्र है कर्ण जिसे दुर्योधन ने अपना मित्र बनाकर अंग देश यानी आज का भागलपुर का राजा बना दिया। भागलपुर बिहार में स्थित है।

अंग राज कर्ण के विषय में कथा है कि, यह पाण्डवों की माता कुंती और सूर्य देव की संतान है। कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य देव को मानता था। यह नियम पूर्वक कमर तक पानी में जाकर सूर्य देव की आराधना करता था और उस समय जरुरतमंदों को दान भी देता था। माना जाता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य देव की विशेष पूजा किया करता था।

अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे। धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया।
👉सास बहू ने की थी पहली सूर्य पूजा
छठ पर्व को लेकर एक कथा यह भी है कि साधु की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए जब महाराज पांडु अपनी पत्नी कुंती और मादरी के साथ वन में दिन गुजार रहे थे।

उन दिनों पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महारानी कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी। इससे कुंती पुत्रवती हुई। इसलिए संतान प्राप्ति के लिए छठ पर्व का बड़ा महत्व है। कहते हैं इस व्रत से संतान सुख प्राप्त होता है।

कुंती की पुत्रवधू और पांडवों की पत्नी द्रापदी ने उस समय सूर्य देव की पूजा की थी जब पाण्डव अपना सारा राजपाट गंवाकर वन में भटक रहे थे।

उन दिनों द्रौपदी ने अपने पतियों के स्वास्थ्य और राजपाट पुनः पाने के लिए सूर्य देव की पूजा की थी। माना जाता है कि छठ पर्व की परंपरा को शुरु करने में इन सास बहू का भी बड़ा योगदान है।
👉कौन हैं छठी मैया और किसने की इनकी पहली पूजा
पुराण की कथा के अनुसार प्रथम मनु प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने पुत्रेष्ठि यज्ञ करने को कहा। इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ। मृत शिशु को छाती से लगाकर प्रियव्रत और उनकी पत्नी विलाप करने लगी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी।

एक ज्योतियुक्त विमान पृथ्वी की ओर आता दिखा। नजदीक आने पर सभी ने देखा कि उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी है। देवी ने प्रियव्रत से कहा कि मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री हूं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों संतान प्रदान करती हूं। देवी ने मृत बालक के शरीर का स्पर्श किया और बालक जीवित हो उठा।

महाराज प्रियव्रत ने अनेक प्रकार से देवी की स्तुति की। देवी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो। राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी छठ व्रत का उल्लेख किया गया है।

Monday, 9 November 2015

Sunday, 8 November 2015

Friday, 6 November 2015